Posts

Showing posts from January, 2023

सीता

सीता , बदलनी होगी तुम्हे , परिभाषा पवित्रता की , अग्निपरीक्षा से नही , तर्को से करना होगा , परम्पराओं को ध्वस्त .. सीता , देना होगा तर्क , अहिल्या के उद्धार का , ताड़का के संहार का , बनानी होंगी तुम्हे , नयी मर्यादाएं .... सीता , बनाओ मर्यादा , स्त्री पर उठते प्रश्नों की , सम्बन्धो की निजता की , लिखना होगा तुम्हे , नया संविधान ... सीता , लिखो संविधान , अपने स्वातंत्र्य का , चरित्र पर उठते प्रश्नों का , कहना होगा तुम्हे , हर एहसास .... सीता , कहो एहसास , अग्निपरीक्षा का , उर्मिला के वियोग का , बन्द करना होगा तुम्हे , सतित्त्व का दौर .... सीता , आना होगा तुम्हे , करने होंगे प्रश्न , बदलनी होगी मान्यताएं , देकर तर्क , रखनी होगी नींव , मानसिकविकार रहित समाज की .... ©ज्योति

कहानी अभी बाकी है

हवा संग उड़ती हुई अलकों को जब समेट लेती हो तुम जुड़े में, मेरी मानो, वहीं से चुन लेती हो अपने जीवन में बंधनो का श्रृंगार .... किसी नन्हे से बच्चे की भांति इधर-उधर कौतुहल से मटकती आंखों को जब झुका लेती हो तुम देख हवसी नज़र मेरी मानो, वहीं कर लेती हो कैद अपनी ही उड़ान .... अपने पसंदीदा काले रंग को जब जोड़ने लगती हो तुम  शकुन-अपशकुन से मेरी मानो, वहीं कर देती हो रामभरोसे अपनी ही किस्मत.... भूलने लगती हो जब तुम स्वाद अपना बढ़ती जिम्मेदारियों के साथ मेरी मानो, वहीं कर देती हो ख़त्म अपने भीतर उम्र भर से सँजोई हुई बाबा की दाना चुगती चिरइया .... मेरी मानो, मत चुनो बन्धन न करो कैद अपनी उड़ान  लिखो अपनी किस्मत खुद से दे दो पर अपने भीतर की चिरइया को और कहो खुल कर के कहानी अभी बाकी है ...... ©ज्योति

हर औरत स्त्री नहीं होती

हर औरत स्त्री नहीं होती .. ओढ़ कर शरीर मादा का अपने मस्तिष्क में नरबुद्धि पालती हुई औरत स्त्री नहीं होती...... पीढ़ी-दर-पीढी संस्कार परंपरा के नाम पर स्त्री को छलती औरत स्त्री नहीं होती ..... अपने जीवन का सारा दर्द दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित करती औरत स्त्री नहीं होती ..... पर्दे को हया का नाम दे किसी की पहचान  कैद करती औरत  स्त्री नहीं होती ..... किसी की हँसी को बेहयाई का नाम दे जीवन उदास करती औरत स्त्री नहीं होती ..... मुँह से निकलते शब्दों को वापस हलक में अटका किसी को गूंगा करती औरत स्त्री नहीं होती ... स्त्री होना आसान नहीं  निकालनी पड़ती है  मस्तिष्क से नरबुद्धि  स्त्री का साथ देने को.... दूसरी स्त्री की मुस्कान में  खोजनी पड़ती है अपनी खुशी और बनना पड़ता है कभी-कभी दूसरे के लिए शब्द अर्थ और वाक्य भी..... छद्म अलंकारों को नकार कर ध्वनि को ही रस मान देना पड़ता है  किसी के जीवन को सौंदर्य .... मुश्किल होती होगी शायद स्त्री होने की ये प्रक्रिया शायद यही है वजह  हर औरत स्त्री नहीं होती..... ©ज्योति 

अब और नहीं

तुम स्त्री हो तुम जब-जब सोचोगी  जीवन में स्नेह तब-तब मिलेगा तुम्हें सब कुछ सिवाय प्रेम के .... अपना सब कुछ कर न्योछावर जब तुम कहोगी प्रेम तुम्हें मिलेगा जवाब- नया कुछ नहीं है तुममें तुम स्त्री हो फ़र्ज़ है तुम्हारा पीड़ा की लहर से जब ठहरने लगेगा शरीर तुम कहोगी दर्द- तुम्हें मिलेगा ताना  समय से पहले बुढ़िया होने का.... बिना किसी गलती के  मिलने पर सजा  जब तुम कहोगी अन्याय- तुम्हें मिलेगा उलाहना सहनशक्ति न होने का .... अपने भीतर के बीज के अंकुरण से पहले ही मर जाने पर जब तुम कहोगी सेहत- तुम्हें मिलेगी तुलना विश्व भर की औरतों से .... इन तानों, उलाहनों, तुलना से जब थकोगी तुम  और कहोगी अब बस और नहीं- तुम्हें मिलेगी तसल्ली अपने लिए खुद खड़े होने की ... ©ज्योति

गर्भपात

यूँ तो बड़ी समझदार थी वो किताबों से लेकर तकनीक तक हर नया आविष्कार  रहता था उसके पास  बस नहीं पली-बढ़ी थी वो दादी-अम्मा के ज़माने में.... नहीं जानती थी के जीव जब आजाता है गर्भ में तब टांगे देने लगती है जवाब  शुरुआती हफ़्ते में ही..... सहेलियों-सी लगने वाली सीढियां बन जाती है अनचाही सौत तमाम लेखकों की कविता  रहती है जिस दिमाग में वो चकराने लगता है सब्जियों की महक मात्र से.... वीर रस की कविता एक सांस में पढ़ने वाली की सांसें दो शब्द भर में फूलने लगती है सब जिम्मेदारी उठा नाचने वाली नहीं टिका पाती बिस्तरे पर सीधे कमर... समस्त दिखते लक्षणों से भी अज्ञानता में वो नहीं समझ पाती के जीव जो था उसके भीतर वो बन कर रक्त बहने लगा है वो अब भी कर देती इसे दरकिनार... फिर मरती हुई-सी पीड़ा की लहर दे जाती है झटका  और ख़त्म हो जाती है समझदारी दे जाता है जवाब  उसका बंधा हुआ सब्र  बह जाती है सारी मर्यादाएं और ख़त्म हो जाते है  उसके भीतर सारे सम्बन्ध.... ©ज्योति

इकलौती बेटियां

इकलौती बेटियां इकलौती बेटियां नहीं होती कभी किसी परिवार का हिस्सा वे तो होती है बस इकलौती नाम का 'ठप्पा' जिसे नहीं होता हक़ एक साथ दो परिवार को अपना कहने का.... इकलौती बेटियां होती है इक अंतहीन सफर-सी जिसकी ज़िंदगी यहीं सोचते हो जाती है ख़त्म के उसे नहीं है हक़ ज़रा भी अपने बारे में सोचने का .... इकलौती बेटियां होती है एक मुक्केबाज़ के पंचिंग बैग सी जिसे जब-तब सहना होता है कुछ तानों का दंश क्योंकि नहीं होता उसे ये हक़ के वो ले सके पक्ष अपने माँ-बाप का .... इकलौती बेटियां होती है बड़ी नालायक जिन्हें नहीं आता ज़रा भी छोड़ कर आगे बढ़ जाना के वो नहीं हो पाती स्वार्थी और बनना चाहती है कंधा पिता का... इकलौती बेटियां नहीं लेकर आती किस्मत इकलौते बेटे सी के कहते है इन बेटों से ब्याही लड़कियों के खुल जाते है भाग्य चली जाती है पांचों उंगलियां घी में .... इकलौती बेटियों से नहीं ब्याहे जाने चाहिए बेटे जिन्हें पाला-पोसा जाता है कलियों से भी ज़्यादा कोमलता से के इन बेटियों से ब्याहने पर हो जाती है उनकी ज़िंदगी बड़ी संघर्षरत.... इकलौती बेटियां जो भी होती है बस नहीं होत...