तुम्हारी हद
वो हांड़-मांस का पुतला मात्र थी, जब तक देखती रही दुनिया को, तुम्हारी नज़र से , जब परखना शुरू किया उसने, सही और गलत अपनी नज़र से, यक़ीन मानो, उसी दिन स्त्री का जन्म हुआ था .... वो तुम्हारे हाथों की कठपुतली मात्र थी, जब तक सुनती रही दुनिया को, तुम्हारी ही आवाज़ से, पर जब सुना उसने, अपने अनुसार हर भाव की नाद को, यक़ीन मानो उसी दिन, स्त्री में प्राण का संचार हुआ था .... वो तुम्हारे जीवन में एक नर्तकी मात्र थी , जब तक चलाते रहे तुम उसे अपनी उंगलियों के इशारे पर, पर जब उठ खड़ी हुई वो, अपने अस्तित्व के लिए, यक़ीन मानो उसी दिन, स्त्री भी इंसान कहलाई थी .... वो तुम्हारी एक शार्गिद ही तो थी, रटती रही जब तक, तुम्हारे बनाए सभ्यता के नियम, पर जब उसने तोड़ा पहली बार, इन नियमों के साथ तुम्हारा घमंड, यक़ीन मानो उसी दिन, स्त्री पहली बार स्वतंत्रता का स्वाद चख पाई थी... यूँ कहना गलत तो नही होगा, के तुम शिकारी मात्र थे , उसके ज़िस्म के, पर जब उसने भरी पहली हुंकार , यक़ीन मानो उसी दिन, तुम्हें तुम्हारी हद याद आयी थी . ©ज्योति