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Showing posts from April, 2023

तुम्हारी हद

वो हांड़-मांस का पुतला मात्र थी, जब तक देखती रही दुनिया को, तुम्हारी नज़र से ,  जब परखना शुरू किया उसने, सही और गलत अपनी नज़र से, यक़ीन मानो, उसी दिन स्त्री का जन्म हुआ था .... वो तुम्हारे हाथों की कठपुतली मात्र थी, जब तक सुनती रही दुनिया को, तुम्हारी ही आवाज़ से, पर जब सुना उसने, अपने अनुसार हर भाव की नाद को, यक़ीन मानो उसी दिन, स्त्री में प्राण का संचार हुआ था .... वो तुम्हारे जीवन में एक नर्तकी मात्र थी , जब तक चलाते रहे तुम उसे अपनी उंगलियों के इशारे पर, पर जब उठ खड़ी हुई वो, अपने अस्तित्व के लिए, यक़ीन मानो उसी दिन, स्त्री भी इंसान कहलाई थी .... वो तुम्हारी एक शार्गिद ही तो थी, रटती रही जब तक, तुम्हारे बनाए सभ्यता के नियम, पर जब उसने तोड़ा पहली बार, इन नियमों के साथ तुम्हारा घमंड, यक़ीन मानो उसी दिन, स्त्री पहली बार स्वतंत्रता का स्वाद चख पाई थी...  यूँ कहना गलत तो नही होगा, के तुम शिकारी मात्र थे , उसके ज़िस्म के, पर जब उसने भरी पहली हुंकार , यक़ीन मानो उसी दिन, तुम्हें तुम्हारी हद याद आयी थी . ©ज्योति

तुम बहुत याद नहीं आते

तुम बहुत याद नहीं आते बस बह जाते हो  आंसू के दो कतरों में जब अटकी रह जाती है हलक में कोई बात ... तुम्हारी याद बिल्कुल नहीं सताती बस खो जाती है कहीं आँखों से नींद  जब नहीं पूरा होता दोनों का देखा कोई ख़्वाब .... साथ बिताए पल नहीं करते बेचैन बस चलने लगता है  मस्तिष्क में चलचित्र बचपन का जब रह जाती है अधूरी कोई छोटी-सी ख्वाहिश .... तुम्हारी कहीं बातें नहीं करती परेशान बस गूंजती है दिन-रात  जैसे बजता हो संगीत कान में जब नहीं होता कोई अकेलेपन में बतियाने को .... यूँ तो तुम नहीं होते कहीं पर न जाने आते हो कहाँ से मेरे सबसे कमजोर क्षणों में करते हो ढेरो बात  सुनते हो शिकायतें सारी नहीं कसते फब्तियां मेरी नाकामयाबी पर .... बस जाते हो रक्तधमनियों में और देते हो हौसला  दुनिया को अकेले जीतने का ...  सच में तुम बहुत याद नहीं आते बस बह जाते हो  आंसू के दो कतरों में  तुम्हारे ज़िक्र मात्र से .... ©ज्योति

वो स्त्री है

तुम पढ़ न सको  उसकी आँखों में उदासी वो सजा देगी इसके लिए  नयनों में काजल की स्याही न माप सको  उसके अंतर्मन की पीड़ा वो ओढ़ लेगी इतना श्रृंगार वो स्त्री है जनाब  खुद जलते हुए भी तुम्हारे जीवन में प्रेम बरसा सकती है ..... ©ज्योति