तुम बहुत याद नहीं आते
तुम बहुत याद नहीं आते
बस बह जाते हो
आंसू के दो कतरों में
जब अटकी रह जाती है
हलक में कोई बात ...
तुम्हारी याद बिल्कुल नहीं सताती
बस खो जाती है कहीं
आँखों से नींद
जब नहीं पूरा होता
दोनों का देखा कोई ख़्वाब ....
साथ बिताए पल नहीं करते बेचैन
बस चलने लगता है
मस्तिष्क में चलचित्र बचपन का
जब रह जाती है अधूरी
कोई छोटी-सी ख्वाहिश ....
तुम्हारी कहीं बातें नहीं करती परेशान
बस गूंजती है दिन-रात
जैसे बजता हो संगीत कान में
जब नहीं होता कोई
अकेलेपन में बतियाने को ....
यूँ तो तुम नहीं होते कहीं
पर न जाने आते हो कहाँ से
मेरे सबसे कमजोर क्षणों में
करते हो ढेरो बात
सुनते हो शिकायतें सारी
नहीं कसते फब्तियां
मेरी नाकामयाबी पर ....
बस जाते हो रक्तधमनियों में
और देते हो हौसला
दुनिया को अकेले जीतने का ...
सच में तुम बहुत याद नहीं आते
बस बह जाते हो
आंसू के दो कतरों में
तुम्हारे ज़िक्र मात्र से ....
©ज्योति
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