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तुम्हारी हद

वो हांड़-मांस का पुतला मात्र थी, जब तक देखती रही दुनिया को, तुम्हारी नज़र से ,  जब परखना शुरू किया उसने, सही और गलत अपनी नज़र से, यक़ीन मानो, उसी दिन स्त्री का जन्म हुआ था .... वो तुम्हारे हाथों की कठपुतली मात्र थी, जब तक सुनती रही दुनिया को, तुम्हारी ही आवाज़ से, पर जब सुना उसने, अपने अनुसार हर भाव की नाद को, यक़ीन मानो उसी दिन, स्त्री में प्राण का संचार हुआ था .... वो तुम्हारे जीवन में एक नर्तकी मात्र थी , जब तक चलाते रहे तुम उसे अपनी उंगलियों के इशारे पर, पर जब उठ खड़ी हुई वो, अपने अस्तित्व के लिए, यक़ीन मानो उसी दिन, स्त्री भी इंसान कहलाई थी .... वो तुम्हारी एक शार्गिद ही तो थी, रटती रही जब तक, तुम्हारे बनाए सभ्यता के नियम, पर जब उसने तोड़ा पहली बार, इन नियमों के साथ तुम्हारा घमंड, यक़ीन मानो उसी दिन, स्त्री पहली बार स्वतंत्रता का स्वाद चख पाई थी...  यूँ कहना गलत तो नही होगा, के तुम शिकारी मात्र थे , उसके ज़िस्म के, पर जब उसने भरी पहली हुंकार , यक़ीन मानो उसी दिन, तुम्हें तुम्हारी हद याद आयी थी . ©ज्योति

तुम बहुत याद नहीं आते

तुम बहुत याद नहीं आते बस बह जाते हो  आंसू के दो कतरों में जब अटकी रह जाती है हलक में कोई बात ... तुम्हारी याद बिल्कुल नहीं सताती बस खो जाती है कहीं आँखों से नींद  जब नहीं पूरा होता दोनों का देखा कोई ख़्वाब .... साथ बिताए पल नहीं करते बेचैन बस चलने लगता है  मस्तिष्क में चलचित्र बचपन का जब रह जाती है अधूरी कोई छोटी-सी ख्वाहिश .... तुम्हारी कहीं बातें नहीं करती परेशान बस गूंजती है दिन-रात  जैसे बजता हो संगीत कान में जब नहीं होता कोई अकेलेपन में बतियाने को .... यूँ तो तुम नहीं होते कहीं पर न जाने आते हो कहाँ से मेरे सबसे कमजोर क्षणों में करते हो ढेरो बात  सुनते हो शिकायतें सारी नहीं कसते फब्तियां मेरी नाकामयाबी पर .... बस जाते हो रक्तधमनियों में और देते हो हौसला  दुनिया को अकेले जीतने का ...  सच में तुम बहुत याद नहीं आते बस बह जाते हो  आंसू के दो कतरों में  तुम्हारे ज़िक्र मात्र से .... ©ज्योति

वो स्त्री है

तुम पढ़ न सको  उसकी आँखों में उदासी वो सजा देगी इसके लिए  नयनों में काजल की स्याही न माप सको  उसके अंतर्मन की पीड़ा वो ओढ़ लेगी इतना श्रृंगार वो स्त्री है जनाब  खुद जलते हुए भी तुम्हारे जीवन में प्रेम बरसा सकती है ..... ©ज्योति

टूटन

ज़ेब खाली थी मेरी इसलिए लुटे जाने से बची रही फ़क़त इक दिल लिए बैठी थी टुकड़े अब उसके भी अनगिनत है ..... तुम्हारी हथेली में दम न था के थामों जरा कसकर हाथ किसी का इक रिश्ता जो दुनिया में घर-सा लगता था अब उसके पते पर चिट्ठी नहीं जाती कोई .... आँचल का रंग मेरे सफ़ेद था  के रंगना था मुझे तुम्हारे रंग में उसे अब दाग इतने बदनामियों के है उस पर के नफ़रत-सी हो चली मुझे अब अपने रंग से .... ©ज्योति

सीता

सीता , बदलनी होगी तुम्हे , परिभाषा पवित्रता की , अग्निपरीक्षा से नही , तर्को से करना होगा , परम्पराओं को ध्वस्त .. सीता , देना होगा तर्क , अहिल्या के उद्धार का , ताड़का के संहार का , बनानी होंगी तुम्हे , नयी मर्यादाएं .... सीता , बनाओ मर्यादा , स्त्री पर उठते प्रश्नों की , सम्बन्धो की निजता की , लिखना होगा तुम्हे , नया संविधान ... सीता , लिखो संविधान , अपने स्वातंत्र्य का , चरित्र पर उठते प्रश्नों का , कहना होगा तुम्हे , हर एहसास .... सीता , कहो एहसास , अग्निपरीक्षा का , उर्मिला के वियोग का , बन्द करना होगा तुम्हे , सतित्त्व का दौर .... सीता , आना होगा तुम्हे , करने होंगे प्रश्न , बदलनी होगी मान्यताएं , देकर तर्क , रखनी होगी नींव , मानसिकविकार रहित समाज की .... ©ज्योति

कहानी अभी बाकी है

हवा संग उड़ती हुई अलकों को जब समेट लेती हो तुम जुड़े में, मेरी मानो, वहीं से चुन लेती हो अपने जीवन में बंधनो का श्रृंगार .... किसी नन्हे से बच्चे की भांति इधर-उधर कौतुहल से मटकती आंखों को जब झुका लेती हो तुम देख हवसी नज़र मेरी मानो, वहीं कर लेती हो कैद अपनी ही उड़ान .... अपने पसंदीदा काले रंग को जब जोड़ने लगती हो तुम  शकुन-अपशकुन से मेरी मानो, वहीं कर देती हो रामभरोसे अपनी ही किस्मत.... भूलने लगती हो जब तुम स्वाद अपना बढ़ती जिम्मेदारियों के साथ मेरी मानो, वहीं कर देती हो ख़त्म अपने भीतर उम्र भर से सँजोई हुई बाबा की दाना चुगती चिरइया .... मेरी मानो, मत चुनो बन्धन न करो कैद अपनी उड़ान  लिखो अपनी किस्मत खुद से दे दो पर अपने भीतर की चिरइया को और कहो खुल कर के कहानी अभी बाकी है ...... ©ज्योति

हर औरत स्त्री नहीं होती

हर औरत स्त्री नहीं होती .. ओढ़ कर शरीर मादा का अपने मस्तिष्क में नरबुद्धि पालती हुई औरत स्त्री नहीं होती...... पीढ़ी-दर-पीढी संस्कार परंपरा के नाम पर स्त्री को छलती औरत स्त्री नहीं होती ..... अपने जीवन का सारा दर्द दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित करती औरत स्त्री नहीं होती ..... पर्दे को हया का नाम दे किसी की पहचान  कैद करती औरत  स्त्री नहीं होती ..... किसी की हँसी को बेहयाई का नाम दे जीवन उदास करती औरत स्त्री नहीं होती ..... मुँह से निकलते शब्दों को वापस हलक में अटका किसी को गूंगा करती औरत स्त्री नहीं होती ... स्त्री होना आसान नहीं  निकालनी पड़ती है  मस्तिष्क से नरबुद्धि  स्त्री का साथ देने को.... दूसरी स्त्री की मुस्कान में  खोजनी पड़ती है अपनी खुशी और बनना पड़ता है कभी-कभी दूसरे के लिए शब्द अर्थ और वाक्य भी..... छद्म अलंकारों को नकार कर ध्वनि को ही रस मान देना पड़ता है  किसी के जीवन को सौंदर्य .... मुश्किल होती होगी शायद स्त्री होने की ये प्रक्रिया शायद यही है वजह  हर औरत स्त्री नहीं होती..... ©ज्योति