टूटन

ज़ेब खाली थी मेरी
इसलिए लुटे जाने से बची रही
फ़क़त इक दिल लिए बैठी थी
टुकड़े अब उसके भी अनगिनत है .....

तुम्हारी हथेली में दम न था
के थामों जरा कसकर हाथ किसी का
इक रिश्ता जो दुनिया में घर-सा लगता था
अब उसके पते पर चिट्ठी नहीं जाती कोई ....

आँचल का रंग मेरे सफ़ेद था 
के रंगना था मुझे तुम्हारे रंग में उसे
अब दाग इतने बदनामियों के है उस पर
के नफ़रत-सी हो चली मुझे अब अपने रंग से ....


©ज्योति

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