कहानी अभी बाकी है

हवा संग उड़ती हुई अलकों को
जब समेट लेती हो तुम जुड़े में,
मेरी मानो, वहीं से चुन लेती हो
अपने जीवन में
बंधनो का श्रृंगार ....

किसी नन्हे से बच्चे की भांति
इधर-उधर कौतुहल से मटकती आंखों को
जब झुका लेती हो तुम देख हवसी नज़र
मेरी मानो, वहीं कर लेती हो कैद
अपनी ही उड़ान ....

अपने पसंदीदा काले रंग को
जब जोड़ने लगती हो तुम 
शकुन-अपशकुन से
मेरी मानो, वहीं कर देती हो रामभरोसे
अपनी ही किस्मत....

भूलने लगती हो जब तुम स्वाद अपना
बढ़ती जिम्मेदारियों के साथ
मेरी मानो, वहीं कर देती हो ख़त्म
अपने भीतर उम्र भर से सँजोई हुई
बाबा की दाना चुगती चिरइया ....

मेरी मानो, मत चुनो बन्धन
न करो कैद अपनी उड़ान 
लिखो अपनी किस्मत खुद से
दे दो पर अपने भीतर की चिरइया को
और कहो खुल कर के
कहानी अभी बाकी है ......

©ज्योति

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