गर्भपात



यूँ तो बड़ी समझदार थी वो
किताबों से लेकर तकनीक तक
हर नया आविष्कार 
रहता था उसके पास 
बस नहीं पली-बढ़ी थी वो
दादी-अम्मा के ज़माने में....

नहीं जानती थी
के जीव जब आजाता है गर्भ में
तब टांगे देने लगती है जवाब 
शुरुआती हफ़्ते में ही.....

सहेलियों-सी लगने वाली सीढियां
बन जाती है अनचाही सौत
तमाम लेखकों की कविता 
रहती है जिस दिमाग में
वो चकराने लगता है
सब्जियों की महक मात्र से....

वीर रस की कविता
एक सांस में पढ़ने वाली की सांसें
दो शब्द भर में फूलने लगती है
सब जिम्मेदारी उठा नाचने वाली
नहीं टिका पाती बिस्तरे पर सीधे कमर...

समस्त दिखते लक्षणों से भी
अज्ञानता में वो नहीं समझ पाती
के जीव जो था उसके भीतर
वो बन कर रक्त बहने लगा है
वो अब भी कर देती इसे दरकिनार...

फिर मरती हुई-सी पीड़ा की लहर
दे जाती है झटका 
और ख़त्म हो जाती है समझदारी
दे जाता है जवाब 
उसका बंधा हुआ सब्र
 बह जाती है सारी मर्यादाएं
और ख़त्म हो जाते है 
उसके भीतर सारे सम्बन्ध....

©ज्योति

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